सरस्वती पूजा सनातन धर्म की उन उपासनाओं में से है, जो ज्ञान, विद्या, बुद्धि, वाणी और कला से सीधे जुड़ी हुई है। यह पूजा वसंत पंचमी के दिन की जाती है और माँ सरस्वती को समर्पित होती है।
आज के समय में यह देखने को मिलता है कि यह पर्व विशेष रूप से बिहार और पूर्वांचल में अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है, परंतु इसके मूल और शास्त्रीय आधार सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैले हुए हैं।


माँ सरस्वती का शास्त्रीय परिचय

माँ सरस्वती को शास्त्रों में—

  • वाणी की अधिष्ठात्री देवी
  • ज्ञान और विवेक की शक्ति
  • ब्रह्मज्ञान प्रदान करने वाली शक्ति

माना गया है।

वैदिक उल्लेख

माँ सरस्वती का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

ऋग्वेद (6.61.7) में कहा गया है:

“प्र नो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।”
अर्थ: हे सरस्वती देवी! आप हमें ज्ञान, शक्ति और वैभव प्रदान करें।

यहाँ सरस्वती केवल नदी नहीं, बल्कि ज्ञान की दिव्य चेतना हैं।


सरस्वती पूजा कब और क्यों की जाती है?

वसंत पंचमी का शास्त्रीय महत्व

  • माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी
  • सूर्य उत्तरायण में, ऋतु परिवर्तन का समय
  • प्रकृति में नवीनता, सृजन और ऊर्जा का संचार

तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार यह काल

विद्यारम्भ, यज्ञ और अध्ययन
के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।

इसी कारण:

  • बच्चों का विद्यारम्भ (अक्षर लेखन)
  • शास्त्रों का अध्ययन
  • कला, संगीत, लेखन की साधना
    इसी दिन आरंभ की जाती है।

सरस्वती पूजा की पौराणिक कथा

ब्रह्मा और सरस्वती की उत्पत्ति कथा

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार—
सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी को अनुभव हुआ कि

सृष्टि तो है, पर उसमें ज्ञान और चेतना का अभाव है।

तब ब्रह्मा जी के मुख से माँ सरस्वती प्रकट हुईं।
उन्होंने—

  • वीणा से नाद उत्पन्न किया
  • शब्द, भाषा और ज्ञान को सृष्टि में प्रवाहित किया

इसी कारण उन्हें—

  • वाणी
  • संगीत
  • शिक्षा
    की अधिष्ठात्री देवी कहा गया।

सरस्वती पूजा की विधि (शास्त्रानुसार)

पूजा का समय

  • प्रातःकाल या मध्याह्न
  • पंचमी तिथि में

आवश्यक वस्तुएँ

  • माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र
  • श्वेत वस्त्र (देवी को श्वेत प्रिय है)
  • पुस्तकें, कलम, वाद्य यंत्र
  • पीले पुष्प, केसर, हल्दी

पूजा क्रम

  1. स्नान एवं शुद्धि
  2. संकल्प
  3. सरस्वती वंदना
  4. पुस्तक-पूजन
  5. विद्या-अपराध क्षमा प्रार्थना

सरस्वती स्तोत्र में कहा गया है:

“या कुन्देन्दु तुषार हार धवला…”


बिहार में सरस्वती पूजा का विशेष महत्व क्यों?

यह धारणा कि “सरस्वती पूजा केवल बिहार की है” आंशिक सत्य है।

वास्तविक कारण

  • प्राचीन तक्षशिला और नालंदा परंपरा
  • शिक्षा को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानना
  • गुरु-शिष्य परंपरा का गहरा प्रभाव

बिहार में:

  • छात्र स्वयं चंदा एकत्र कर पूजा करते हैं
  • इसे सांस्कृतिक शिक्षा आंदोलन की तरह मनाया जाता है
  • यह पूजा सामूहिक विद्या-संकल्प बन गई है

इसलिए आज यह पर्व बिहार की पहचान जैसा दिखता है, जबकि इसका मूल सनातन और अखिल भारतीय है।


क्या सरस्वती पूजा केवल एक दिन की है?

शास्त्रों के अनुसार—

  • पूजा का दिन विशेष है
  • पर विद्या-साधना सतत प्रक्रिया है

मनुस्मृति कहती है:

विद्या विनयेन शोभते
अर्थ: विद्या विनम्रता से ही शोभित होती है।


आधुनिक समय में सरस्वती पूजा का संदेश

आज के युग में सरस्वती पूजा हमें सिखाती है—

  • ज्ञान को केवल नौकरी का साधन न बनाएं
  • विद्या को धर्म और विवेक से जोड़ें
  • तकनीक + संस्कृति का संतुलन बनाए रखें

निष्कर्ष

सरस्वती पूजा—

  • केवल बिहार का पर्व नहीं
  • केवल एक दिन की पूजा नहीं
  • बल्कि सनातन धर्म की बौद्धिक आत्मा है

वसंत पंचमी हमें स्मरण कराती है कि—

ज्ञान के बिना शक्ति अंधी है और विद्या के बिना समाज।

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